मेवाड़ के राजा होने के बावजूद शाहजहां के वहा दरबारी क्यो बने अमर सिह राठौड़ | amar singh rathore history in hindi

भारतीय इतिहास पराक्रमी शूर की कहानियों से भरा पड़ा है

भारतीय पराक्रमी शूरवीरों की गाथा

भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. अपने शौर्य के बल पर ये महान वीर ने अपने खून से इतिहास इस प्रकार सिंचित है की आज समय मे भी इन महान की वीर गाथाएं कानों में सुनाई पड़ती है.

आज हम आपको अपने समय के एक ऐसे ही शक्तिशाली शूरवीर का इतिहास बता रहा है जिसका नाम अमर सिंह राठौर amar singh rathore था.

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अमर सिंह राठौर amar singh rathore बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि, चंचल स्वभाव के ओर स्वाभिमानी व्यक्तित्व थे. अमर सिंह राठौड़ अपने समय के मारवाड़ राज्य जो की आज पश्चिमी राजस्थान में स्थित है वहाँ के प्रसिद्ध राजपूत थे.

अमर सिंह राठौड़ के पिता महाराणा गज सिंह थे. जोकि मुगल शासक शाहजहाँ के अधीन मारवाड़ क्षेत्र का शासक थे. उनके पुत्र अमर सिंह राठौड़ एक महान योद्धा और देशभक्त थे. उनकी बहादुरी और युद्ध क्षमता कारण ही उन्हें शाहजहाँ द्वारा शाही सम्मान और व्यक्तिगत मान्यता मिली.

अमर सिंह राठौड़ amar singh rathore के पिता खुद शासक थे. उनके पुत्र अमर सिंह राठौर जो परिवार के सबसे बड़े पुत्र होने के बावजुद उनको अपने पिता का सिंहासन क्यों प्राप्त नहीं हुआ?

उन्होंने शाहजहाँ के दरबार में एक राजदरबारी के रूप में क्यों काम किया?

अमर सिंह राठौर amar singh rathore की प्रसिद्धि और बहादुरी की कीर्ति चारों तरफ फैला हुआ था. उनके इस स्वभाव के कारण यह निर्णय लिया गया था कि पिता के सिंहासन के अगले महान देशभक्त, उत्तराधिकारी, राज्यवासियो को प्राप्त करते हुए देखाई दे रहा था.

लेकिन यह जरूरी नहीं है की जैसा एक सोचता है, वेसाही दूसरा सोचता है.

अमर सिंह राठौर की फेलती कीर्ति से महाराजा गजसिंह की उपपत्नी को इर्षा होने लगी. उसने ऐसा सडयंत्र रचा की जिसके कारण महाराजा ने अपना श्रेष्ठ पुत्र को राजगादी न देकर अपने कनिष्क पुत्र महाराजा जसवंत सिंह को मारवाड़ का शासक बना दिया.

अपने पिता के इस निर्णय का अमर सिंह ने प्रतिकार तक नहीं किया. और यह बात से पता चलता है की अमर सिंह कितने सुलझे हुई इंसान थे.

मुगल शासक शाहजहाँ ने भी जसवंत सिंह को मारवाड़ के शासक की मान्यता दे दी. शाहजहाँ अमर सिंह की सूझबूझ और योग्यता से अच्छी तरह वाकिफ थे.

उन्होंने राठौड़ को अपना राजदरबारी बनाया और अपने मुश्किल अभीयानो की आगवानी के लिए. सम्राट ने अमर सिंह amar singh rathore को हमेशा आगे रखा.

सम्राट के भाई सलाबत खान राज्य में अमर सिंह के उथान से जलते थे. और मौका ढूंढ रहे थे उस पल का कब वो अमर सिंह को बदनाम कर सके. फिर वह दिन भी आया जिसकी तलाश सलाबत खान सालों से कर रहा था.

दरबार में सम्राट के समक्ष सलाबत खान और राठौड़ के बीच कई विवाद में, राठौड़ ने सलाबत को मौके पर ही मार दिया. शाहजहाँ इस घटना से ढगे रह गया और उन्होंने अपने सैनिकों को अमर सिंह को मारने का आदेश दिया

अमर सिंह amar singh rathore अकेले ने सम्राट के सैनिकों को भी मोत के घाट उतार दिया. जब अमर सिंह अपने घोड़े पर सवार होके वहां से भागने लगे तो किल्ले के सारे दरवाजे बंद देखते है. ओर अमर सिंह घोड़े की सवारी के साथ किले की दीवार के माध्यम से कूद गये. तभी अमर सिंह का घोड़ा वीरगति को प्राप्त हुआ.

अगले दिन सम्राट ने यह आदेश जारी किया कि जो अमृत सिंह को मारेगा. उसे जागीरदार बनाया जाएगा. अर्जुन सिंह जो अमर सिंह के साले थे. वह इस लालच में आ जाता है. उन्होंने धोखा से अमर सिंह की हत्या कर दी. अर्जुन सिंह ने उनका गला काटकर सम्राट को भेंट कर दिया.

खैर ये बात तो एक बुद्धिजीवी भी जानता है की जो व्यक्ति अपनो नहीं बन सकता. वह दूसरों को भी मौका मिलने पर धोखा दे सकता है. तो शाहजहाँ ने अर्जुन सिंह को भी मरवा दिया.

जब अमर सिंह amar singh rathore की मुत्यु का पता उनकी पत्नी को चला. टैब उनकी पत्नी ने राजपूत सैनिकों के साथ किले पर हमला किया. राजपूत सैनिकों की संख्या मुगल सैनिकों से कम होने के बावजूद भी राजपूत सेना अमर सिंह का शरीर को किले से बाहर निकाल लिया.

मुगलों और राजपूतों की इस लड़ाई में राजपूतों लड़ते हुए वीरगति प्राप्त हुई. लेकिन मुगल नहीं आए

जिस संकीर्ण दरवाजा के पास अमर सिंह की हत्या की गई उसे शाहजहाँ ने बंध करवा दिया था।

क्योंकि यह दरवाजा

उसे राजपूत बालो के हाथों से उनकी हार की याद दिलाता है

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