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गौतम बुद्ध Biography of gautam buddha in hindi | Gautam buddha story 2021

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Biography of gautam buddha in hindi

यू तो हमे कई सन्यासी मिले, परंतु इस धरती पर भगवान बुद्ध God buddha जैसा न कोई हुआ और न कोई होगा. भगवान बुद्ध को भारत मे ही नही बल्कि, अन्य कई देशों में पूजा जाता है. उनको एक बहुत अच्छे फ़ॉलोशोफर के रूप में भी देखा जाता है.

आज हम हजारो ग्रंथ मिलते है, जो बुद्ध के प्रवचनों से भरे हुए हैं. पर उन में से किसी मे भी दोहराव नही है. पर हैरानी की बात तो यह है कि, सोलाह साल को उम्र तक बुढापा, गरीबी और दुख क्या होता है उन्हें पता भी नही था.

तो आइए जानते है, भारतवर्ष ज्ञान के इस नए अध्याय में भगवान गौतम बुद्ध god gautam buddha के बारे में…..

गौतम बुद्ध की जीवनी – Biography of Gautam buddha in hindi

गौतम बुद्ध का जन्म when gautam buddha birthday date 563 ईशा पूर्व शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के नजदीक लुम्बिनी में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजवंश में हुआ था. जो आज नेपाल के नाम से प्रसिद्ध है. उनके पिता का नाम राजा शुद्धोधन था. जो इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा थे. उनकी माता का नाम महामाया था. जो कोलिय वंश की पुत्री और इक्ष्वाकु वंश की महारानी थी.

जन्म के समय गौतम बुद्ध का नाम gautam buddha real name सिद्धार्थ रखा गया था. गौतम बुद्ध के जन्म gautam buddha born के कुछ ही दिनों में (लगभग सात दिनों में) उनकी माता महामाया की मृत्यु हो गई थी. उनकी माता की मृत्यु के बाद सिद्धार्थ की देखभाल महामाया की सगी छोटी बहन महाप्रजापति गौतमी ने की थी.

अपने पुत्र के भविष्य को जानने के लिए राजा शुद्धोधन अपने राज्य के कई ज्ञानी पंडितो को बुलाया. सिद्धार्थ की कुंडली देखकर कई पंडितो ने राजा शुद्धोधन को कहा आपका बेटा बड़ा होकर चक्रवर्ती सम्राट बनेगा. पर वहां उपस्थित पंडितो में से सबसे छोटा कौण्डिन्य नाम का ब्राह्मण खड़ा हुआ और कहा, महाराज शुद्धोधन आपके बालक की केवल एक ही गति है. आपका बालक बड़ा होकर एक नए धर्म की स्थापना करेगा. आपका बेटा बड़ा होकर एक सन्यासी बनेगा.

कौण्डिन्य की यह भविष्यवाणी सुनकर महाराज शुद्धोधन ने दुःख और गरीबी से जुड़ी सारि बातो को राजभवन से निकाल दिया. सुख और भोगविलास के अलावा और कोई बात होने का अहसास भी सिद्धार्थ को नही होने दिया. सिद्धार्थ की खातिरदारी के लिए केवल और केवल सुंदर महिलाओ को ही रखा गया.

अपने यह जीवन की चर्चा खुद सिद्धार्थ ने कुछ इस तरह की थी, में ने एक सुख से भरा हुआ जीवन गुजार था. मेरे तीन महल थे. एक जिसमे में सर्दियों में रहता था, एक जिसमे में गर्मियों में रहता था और एक जिसमे में बरसात में रहता था. बरसात के चार महीनों में मेरे लिए दर्जनों नाचने-गाने वाली यवदीया रहती थी और उनमें एक भी पुरुष नाचने-गाने वाले नही होते थे.

★ गौतम बुद्ध के जन्म की अनसुनी कहानी – Unheard Born gautam buddha story

गौतम बुद्ध के जन्म gautam buddha born की कई कहानियों में से एक कहानी यह भी प्रचलित है. गौतम बुद्ध के जन्म से पहले एक रात रानी महामाया अपने कक्ष में सो रही थी. तब उन्होंने ने एक स्वपन देखा. सपने में उन्होंने देखा कि, छह दांतो वाला एक सफेद हाथी आसमान से आया और उनकी तीन बार प्ररिक्रमा की. परिक्रमा के बाद वह हाथी उनके पेट मे शमा गया.

यह अद्भुत और विचित्र स्वपन के दश महीने बाद माँ महामाया ने एक बच्चे को जन्म दिया. उस बच्चे का नाम सिद्धार्थ रखा गया. सिद्धार्थ का अर्थ होता है, जिसकी हर इच्छा पूरी होती हो. बालक सिद्धार्थ के मुख पर एक अलौकिक तेज था. सिद्धार्थ के जन्म के कुछ दिन बाद असिथ नाम के महात्मा लुम्बिनी की राजधानी कपिलवस्तु पहुँचे.

सिद्धार्थ को देखकर असिथ मुनि पहले तो बहुत प्रसन्न हुए. पर बाद में फूट-फूट पर रोने लगे. जब राजा शुद्धोधन ने उनके रोने की वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि, आपका बेटा बड़ा होकर बुद्ध बनेगा. स्वयं काल भी इस बालक का कुछ नही बिगाड़ पायेगा. पर जब ये बड़ा होगा तब में इस धरती पर नही रहूंगा.

★ गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) का विवाह – Gautam buddha Marriage

महज सोलह साल की उम्र में सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा से करवा दिया गया था. यशोधरा ने सिद्धार्थ को स्वयंवर में चुना था. कुछ ही समय मे सिद्धार्थ यशोधरा के प्यार में पूरी तरह से डूब चुके थे. जिससे राजा शुद्धोधन और राजभवन के बाकी लोगो की चिंता दूर हो गई थी.

राजा शुद्धोधन ने राजभवन से हर उस चीज और लोगो को दूर कर दिया जिससे सिद्धार्थ प्रभावित हो सके. राजा के आदेश पर गरीब, लाचार और बीमार लोगो को राजभवन से दूर कर दिया गया था. राजभवन से आस-पास सुख से भरपूर वातावरण बनाया गया. जल्द ही सिद्धार्थ एक पुत्र के पिता बने. जिसका नाम सिद्धार्थ ने राहुल रखा.

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★ गौतम बुद्ध ( सिद्धार्थ ) का सन्यासी बनने का सफर – Siddharth’s journey to become a monk

एक रोज सिद्धार्थ ने नगरयात्रा करने की इच्छा व्यक्त की. जब यह बात राजा शुद्धोधन को पता चली तब उन्होंने सिद्धार्थ के रास्ते मे आने वाले सभी दुखी, दरिद्र और वृद्ध व्यकियों को हटा दिया. पर वही हुआ जिसका डर राजा शुद्धोधन को था.

नगरयात्रा के समय सिद्धार्थ gautam buddha एक भुखमरी से पीड़ित एक वृद्ध व्यक्ति को देखते है. यह पहली बार था जब सिद्धार्थ कीड़ी वृद्ध व्यक्ति को देख रहे थे. आज से पहले उन्होंने नाही किसी वृद्ध व्यक्ति को देख था और नाही उन्हें ऐसा कुछ पता था. उस वृद्ध व्यक्ति को देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ.

सिद्धार्थ ने अपने मित्र छंदक से पूछा कि यह इंसान ऐसा क्यो है. तब मित्र द्वारा मील जवाब से पहली बार उन्हें पता चला कि, वृद्धावस्था क्या होती है. पहली बार उन्हें पता चला कि, वृद्धावस्था में अपना शरीर कमजोर पड़ जाता है, स्मरण शक्ति भी कमजोर होती है. तब सिद्धार्थ gautam buddha को स्मरण हुआ कि, वह भी एक दिन उस वृद्ध व्यक्ति की तरह ही दिखेंगे.

सिद्धार्थ एक ऐसी जिंदगी जी रहे थे, जिसमे उन्हें पता ही नही था बुढापा भी जीवन का एक हिस्सा है. सिद्धार्थ गौतम से जुड़ी हुई कहानियों के मुताबिक उन्हें पहली बार ये आभास हुआ की, वृद्धावस्था, बुढा होना उम्र का एक ऐसा पड़ाव है जिससे कोई नही बाख सकता. जीवन-मरण जिंदगी की वह सच्चाई है, जिससे लोग मुँह फेर लेते है. रोग , मृत्यु जैसी कई सच्चाइयो से उनका एक कस बाद एक सामना हुआ जिसने सिद्धार्थ को अंदर से जिनजोल दिया. तब पहली बार उन्हें सन्यासी बनने का खयाल आया. पर सन्यास क्या होता है अभी तक सिद्धार्थ को पता नही था.

★ पहली बार हुआ गौतम बुद्ध ( सिद्धार्थ )का सन्यासी से मिलन – Siddhartha meets sanyasi for the first time

एक बार सिद्धार्थ अपने मित्र छंदक के साथ फिर नागरयात्रा पर निकले थे. तब पहली बार उन्होंने एक सन्यासी को देखा. तभी उन्हें पता चला कि, सन्यासी क्या होता है. किस तरह सन्यासी अपना पूरा जीवन दुशरो की भलाई में व्यतीत करते है. शांति पाने के लिए, जिसका लाभ दुशरो को दिलाने के लिए और पुनः संचार के लिए संयरी जिस तरह जीते है, उससे सिद्धार्थ बहुत प्रभावित हुए.

वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु से सिद्धार्थ का मन जूझ रहा था. तभी उनके सामने एक और सन्यासी आया. सन्यास में उन्हें मुक्ति का रास्ता दिखा और उन्होंने अपने दोस्त और सारथी छंदक के सामने सन्यासी बनने का विचार प्रगट किया. उन्होंने के कहा कि, में भी सन्यासी बनुगा, में भी साधुओं के साथ दीक्षा लूँगा, में भी गृहत्याग करूँगा, में भी सन्यास लूँगा.

सिद्धार्थ को इसी फैसले से रोकने के लिए राजा शुद्धोधन ने क्या कुछ नही किया था. महल के अंदर भोगविलास के सारी सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई थी. इसीलिए तो सिद्धार्थ को दुःख और गरीबी से जुड़ी सारी बातों से भी दूर रखा गया था.

★ सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बनने का सफर – Journey from Siddhartha to become Gautam Buddha

सिद्धार्थ अब 29 साल के हो चुके थे. तब उन्होंने अपने मित्र छंदक को अपना घोड़ा लाने को कहा. छंदक समज गया था कि, आज उनके मित्र और आजकुँवर सिद्धार्थ की आज महल में आखरी रात है. छंदक जब तक घोड़ा लाते उस से पहले सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा और बेटे राहुल को आखरी बार देखने के लिए उनके कक्ष में गये.

जहाँ राहुल और यशोधरा सो रही थी. उन्हें सोता देख सिद्धार्थ कक्ष की दहली पर रुक गए और वही से उन्हें देखते रहे. यशोधरा की सिद्धार्थ ने अपना हाथ बढ़ाया पर रुक गये. उनहोने सोचा कही जाग गए तो…वही बाहर से अपने मित्र छंदक के पुकारने की आवाज आई.

वह एक बार अपने बेटे राहुल का चेहरा देखना चाहते थे. सिद्धार्थ एक बार अपने पत्नी यशोधरा से आज्ञा लेना चाहते थे, पर वह इस असमंजस ने थे कि कहि उन्होंने दीक्षा लेने से रोक लिया तो…इसीलिए वह बिना आज्ञा मांगे ही चले गये. राजमहल में मोज-मस्ती की सारी सुख-सुविधाएं थी. पर आज वह सिद्धार्थ को उन सभी का मोह नहीं लग रहा था.

भले ही सिद्धार्थ ने हमारी नजर में पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल के साथ अन्याय किया हो. पर इस से बुद्ध की अपनी मनुष्य होने की स्थिति है, उस मे कोई बड़ी कटौती नही होती. उसके मन मे उस वक्त द्वंद्व रहा होगा वो सर्वथा मानवीय द्वंद है.

सिद्धार्थ जब अपने घोड़े कंथक पर सवार होकर निकले तब उनके सामने एक और चुनौती सामने आ गयी. राजा शुद्धोधन के कहने पर महल के सारे दरवाज़े बंद थे और सिपाहियो का प्रबल बंदोबस्त था. पर कई पौराणिक कथाओं और बुद्ध ग्रथो की माने तो, जब सिद्धार्थ अपने घोंड़े कंथक पर सवार होकर जब निकले तब सारे सिपाही गहरी नींद में चले गये और महल के दरवाजे अपने आप खुल गए.

जब सिद्धार्थ किले के बाहर निकले तब एक और चुनौती उनके सामने आ गई. जब सिद्धार्थ अपने मार्ग से जा रहे थे तब वस्वतिमार नाम के साधु ने उनका मार्ग रोका. वस्वतिमार ने सिद्धार्थ के सामने उनके भविष्य को लेकर एक भविष्यवाणी की. उन्होंने कहा कि, सिद्धार्थ आज से सात दिन बाद तुम इस दुनिया के सात द्वीप और नौ खंडो के अधिपति होंगे. तूम एक अजेय चक्रवर्ती सम्राट बनोंगे.

उसके उत्तर में सिद्धार्थ में जवाब देते हुए कहा कि, मुजे चक्रवर्ती या सम्राट नही बनना. मुजे राजचक्र नही चाहिए, मुजे तो धर्मचक्र धारण करना है. तुम मुजे जो लालच दे रहे हो, मुजे वो मेरे मार्ग से नही भटका सकता. इस तरह सिद्धार्थ ने वस्वतिमार की लालच को भी ठुकरा दिया.

सवेरा होते ही सिद्धार्थ अनुमा नदी के तट पर पहुच गए. वहाँ उन्होंने अपने सारे आभूषण छंदक को दे दिए और राजमहल वापस लौट जाने को कहा. उन्होंने अपने बालों को काटकर अपनी पत्नी यशोधरा को देने के लिए कहा. इस तरह सिद्धार्थ सबसे पहले एक सन्यासी बने.

★ सिद्धार्थ की अपने गुरु की खोज – Siddharth’s search for his mentor

सिद्धार्थ अब एक सन्यासी तो बन गए थे. पर अब उन्हें एक गुरु की खोज थी. सिद्धार्थ कपिलवस्तु से चलते हुए मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पहुँचे. वहां उनकी मुलाकात आलारकलाम से हुई. आलारकलाम ने सिद्धार्थ को साधना की कई विधियाँ सिखाई. सिद्धार्थ के मन मे कई जिज्ञासाएँ समंदर की तरह उफान मार रही थी. आलारकलाम ने सिखाई हुई योग विधियों से भी उनके मन को जिज्ञासाएँ पूरी नही हुई.

उसके बाद सिद्धार्थ अपने नए गुरु की खोज में निकल गए. गुरु खोज के दौरान सिद्धार्थ की मुलाकात उत्तररामपुत्रक से हुई. उत्तररामपुत्रक से उन्होंने योग की दुशरी कई विधियाँ सीखी. परंतु यहाँ से भी उनकी जिज्ञासाएँ पूरी नही हुई. सिद्धार्थ ने अपनी यात्रा के दौरान हर तरह के अनुभव का अहसास किया.

इस अनुभव के दौरान उन्होंने खाना छोड़ दिया, पानी तक भी छोड़ दिया था. उस वक्त सिद्धार्थ खुद मरणावस्था तक पहुच गए थे. उनका शरीर एक वृद्ध व्यक्ति की तरह लग रहा था.

★ सिद्धार्थ की ज्ञानप्राप्ति अवस्था का मार्ग – Siddhartha’s path to enlightenment

सिद्धार्थ को ज्ञानप्राप्ति के नए रास्ते ढूंढने की कई जिज्ञासाएँ थी. उस समय उनको एक वीणावादक दिखा. सिद्धार्थ ने गौर किया कि, वीणावादक जब विणा के तार को ढीला छोड़ देता था तब संगीत नही बजता था. जब वीणावादक विणा के तार को ज्यादा खींचता था तब तार टूट जाता था.

वीणावादक जब विणा के तार को मध्यम रखता था तब, मधुर संगीत बजता था. उसी से प्रेरित होकर सिद्धार्थ ने ज्ञानप्राप्ति अवस्था का मार्ग का नया मार्ग मध्यम मार्ग निकाला. जब बुद्ध थे तब अतिरेको का जमाना था. उस समय कर्मकांड का भी अतिरेक था और दुशरी तरफ सन्यासियो का भी अतिरेक था.

एक तरफ भोगविलास और कर्मकांड का अतिरेक और दुशरी तरफ वैराग और सन्यास का अतिरेक था. यह दोनों अतिरेक के बीच बुद्ध ने मच्छम निकाय की बात की. मच्छम निकाय यानी बीच का रास्ता मतलब मध्यम मार्ग. मध्यम मार्ग गौतम बुद्ध की शिक्षा का सार माना जाता है.

★ सिद्धार्थ गौतम के बुद्ध बनने की कथा – Story of Siddharth Gautama becoming Buddha

सिद्धार्थ गौतम द्वारा मध्यम मार्ग की शिक्षा देने के बाद सिद्धार्थ गौतम आज के बिहार के गया जिले में पहुँचे. वहाँ पर सिद्धार्थ गौतम उस पीपल वृक्ष के पास पहुँचे जिसे आज लोग बोधिवृक्ष के नाम से जानते है. उस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ गौतम फिर एक बार ध्यानावस्था में ध्यान के लिए बैठे.

ध्यान में बैठने से पहले उन्होंने संकल्प लिया. मन इसी आसान में, इसी शरीर से जो अप्राप्त बोधि है, उसे प्राप्त किये बिना में नही उठूंगा. एक तरफ सिद्धार्थ प्रण करके आसन में लीन थे. वही दुशरी तरफ उन्हें अपने जीवन के बीते हुए पल उनके सामने आने लगे थे. तब उन्होंने बुद्ध की संबोधि प्राप्त की थी. उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी.

है ग्रहकारक अनेको बार मे ने एक संसार मे मेने जन्म लिया है. इस भकचक्र में मेरा आवन-जावन रहा है. अब तुजे मेने जान लिया है, समज लिया है. अब तू पुनः घर नही बना सकता है, यह मेरा अंतिम जन्म है अब मेरा पुनः जन्म नही होगा, अब मेरा पुनः आगमन नही होगा.

उसके बाद गौतम बुद्ध अपने शिष्यों से मिलने और उन्हें ज्ञानप्राप्ति देने के लिए वह आज के सारनाथ गए. वहाँ उन्होंने एक पीपल वृक्ष के नीचे अपने पांच शिष्यो को ज्ञान दिया. आज भी सारनाथ में उस पीपल वृक्ष के नीचे गौतम बुद्ध और उनके पांच शिष्यों की प्रतिमाएं मौजूद है.

Gautam buddha quotes hindi

।।आत्म दीपो भवः।।

अर्थात :- मेरे ज्ञान का इस्तेमाल उतना ही करो जितनी जरूरत हो और आगे बढ़ो

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