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Vijay Diwas in Hindi | भारत में विजय दिवस 16 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है?

Vijay Diwas

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अंग्रेजो द्वारा किए गए जाति के आधार पर बंटवारे मे भारत के तीन हिस्से हुए. जिसमे से एक बना आज का भारत और दूसरे दो हिस्से बने पाकिस्तान.

एक ईस्ट पाकिस्तान और दूसरा वेस्ट पाकिस्तान. ईस्ट पाकिस्तान मे रहने वाले ज्यादातर लोग मुस्लिम समुदाय के थे. हालांकि वह ज्यादातर लोग उर्दू भाषा की जगह बांग्ला भाषा का इस्तमाल करते थे.

जिसका नतीजा निकलकर आया वेस्ट पाकिस्तान ईस्ट पाकिस्तान पर शोषण और अत्याचार करने लगा.

जब यह अत्याचार बहुत ही ज्यादा होने लगा तब ईस्ट पाकिस्तान के लोगो ने वहा पर विद्रोह कर लिया और अपने अलग देश की मांग की. दुनिया के इतिहास मे १६ दिसम्बर को सुनहरे अक्षरों से लिखा गया. क्योंकि, १६ दिसंबर १९७१ यह वही दिन था जब दुनिया के युद्धो के इतिहास मे एक सेना का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण हुआ था.

भारत और पाकिस्तान के बीच हुए यह भयानक युद्ध के १३ दिनो के बाद दुनिया के नक्शे पर एक नए देश का उदय हुआ. जिसे आज लोग बांग्लादेश के नाम से जानते है.

इसी दिन पर पाकिस्तान ने अपना आधे से ज्यादा भू-भाग, अपनी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा और दक्षिण एशिया मे अपनी भू-राजनीतिक भूमिका को को दिया था.

दुनिया के इतिहास और राजनीतिक भूगोल को बदलने वाले मानेक शॉ, जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और भारत की सेना के जाबाजो को वीरगाथा को यूं ही भुलाया नही जा सकता. आज के समय मे भले उनमें से ज्यादातर लोग इस दुनिया मे मौजूद नही है, पर उनकी शौर्यगाथा को कहने वाला बांग्लादेश आज भी मौजूद है. वही वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए विजय दिवस (Vijay Diwas) को मनाया जाता है।

१९७१ के युद्ध के बारे मे जाने…

साल १९७१ का युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच का युद्ध था परंतु भारत का युद्ध करने का कारण ईस्ट पाकिस्तान के लोगो को वेस्ट पाकिस्तान के अत्याचारों से बचना था.

यह युद्ध का आरंभ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के चलते ३ दिसंबर, १९७१ मे पाकिस्तान द्वारा भारतीय वायुसेना के ११ सेना के वायु मथको पर एक के बाद एक हवाई हमले से हुआ था. इसके परिणामरूप भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान मे बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम मे बंगाली राष्ट्रवादी गुटों के समर्थन के लिए तैयार हो गई.

पाकिस्तानी जनरल जैकब को भारत के लेफ्टिनेंट जनरल मानेक शॉ का मैसेज मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए वह तुरंत ही ढाका पहुंचे. उस समय जनरल जैकब की हालत बिगड़ रही थी.

भारत के पास केवल तीन हजार सैनिक और वे भी ढाका (बांग्लादेश की राजधानी) से ३० किलोमीटर दूर थे. वहीं, दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी के पास ढाका मे २६ हजार ४०० सैनिक थे.

भारतीय सेना ने युद्ध पर पूरी तरह से अपनी पकड़ बना ली. भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर जगजीत अरोड़ा अपने दलबल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द समाप्त होने वाला था.

जनरल जैकब के हाथ मे कुछ भी नही था. जनरल जैकब जब कर्नल नियाजी के कमरे मे घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था. आत्मसमर्पण का दस्तावेज टेबल पर रखा हुआ था. और फिर १६ दिसंबर १९७१ को दुनिया के युद्धो के इतिहास मे एक सेना का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण हुआ था

उस युद्ध के हीरो लेफ्टीनेंट जनरल मानेक शॉ, जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और भारतीय सेना के शुरवीरो के सम्मान और युद्ध मे शहिद वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए १६ दिसंबर १९७१ को विजय दिवस (Vijay Diwas) बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है.

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