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Jagannath Puri temple history in hindi | जगन्नाथ पुरी मंदिर का इतिहास | jagannath puri temple facts | jagannath puri temple mystery

जगन्नाथ पुरी मंदिर का इतिहास –  JAGANNATH PURI Temple History

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द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के 36 साल बाद और द्वारिका नगरी के नस्ट हो जाने के बाद श्री कृष्ण जब हिरण्य नदी के किनारे विश्राम कर रहे थे तब जला नाम के पारधी ने उनके पैर पर बाण मार था…और यही पर श्रीकृष्ण ने अपना देह त्याग किया था. सत्य, प्रेम,भक्ति और शक्ति के पुजारी श्रीकृष्ण ने ईस पुर्व 3102 में चैत्री सुक्र प्रतिबधा की दोपहर 2:27 मिनिट में अपने मानव शरीर को छोड़कर चले गए थे.

फिर अर्जुन द्वारा श्री कृष्ण का अंतिम संस्कार किया गया. परंतु बहुत कोशिश के बाद भी श्री कृष्ण के शरीर का एक अंग (नाभि) नही जल रहा था. तब अर्जुन ने नाभि को समुद्र में विसर्जित कर दिया था.

कुछ समय बाद वह नाभि श्री कृष्ण के नीले रंग की एक मूर्ति में परिवर्तित हो गई…और विस्वावस्थ नाम के आदिवासी को मिली. मूर्ति नीले रंग की होने के कारण विस्वावस्थ ने मूर्ति का नाम नीलमाधव रखा.

विस्वावस्थ ने नीलमाधव की मूर्ति को पास के जंगल मे एक गुफा में छुपा दिया और बड़े भक्ति भाव से नीलमाधव की पूजा करने लगा. इस बात की खबर राजा इंद्रद्युम को लगी. मूर्ति के बारे में पता लगाने के लिए राजा इंद्रद्युम l विश्वासु मंत्री विद्यापति नाम के ब्राह्मण को जंगल भेजते है.

विद्यापति मूर्ति के बारे में जानने के लिए विस्वावस्थ के पास आते है. परंतु विद्यापति को विस्वावस्थ की पुत्री से प्रेम हो जाता है और वह विस्वावस्थ की पुत्री से विवाह कर लेता है.  एक बार विद्यापति अपने ससुर विस्वावस्थ को मूर्ति के दर्शन कराने की विनती करता है.

विद्यापति के बार – बार विनती करने कारण एक बार विस्वावस्थ आपने दामाद को मना नही कर पाये. विस्वावस्थ विद्यापति आंखों पर पट्टी बांध कर उस गुफा में ले जाते है. परंतु विद्यापति भी बहुत चालक होता है. वह रास्ते मे सरसो के बीज गिरा देता है.

कुछ दिनों के बाद वह बीज अंकुरित होते है…और गुफा के रास्ता साफ दिखाई देता है. गुफा के बारे में विद्यापति राजा
इंद्रद्युम को बतात है. जब राजा इंद्रद्युम नीलमाधव के दर्शन करने के लिए गुफा में जाते है तो वह पर नीलमाधव की मूर्ति नही मिलती है.

नीलमाधव के दर्शन ना होने कारण राजा इंद्रद्युम बहुत निराश होकर अपने राज भवन में लौट जाते है. और अपनी गलती का पश्चयताप हदयपूर्वक करते है. एक रात जब राजा इंद्रद्युम सो रहे होते है. तब स्वयं भगवान विष्णु उनके सपने में आते है और कहते है की.

कुछ दिनों में समुद्र तट पर एक लकड़ी का लट्ठा तैरते हुए आएगा और उस पर शंख का चिह्न भी बना होगा. उसी लकड़ी के मूर्ति बनाकर मंदिर में स्थापित करने की सूचना देते है.’ भगवान विष्णु के कहे अनुसार एक लकड़ी का लट्ठा समुद्र में तैरते हुए आया.

राजा इंद्रद्युम फौरन अपने राज्य के महान शिल्पकारों की बुलाकर उस लकड़ी में से मूर्ति बनाने का कार्य देते है. परंतु लकड़ी के स्पर्श से ही शिल्पकारों के औजार टूट जाते थे. इस बात से राजा इंद्रद्युम काफी परेशान रहने लगे.

फिर एक दिन देवताओ के शिल्पकार श्री विश्वकर्माजी राजा इंद्रद्युम के राज्य में आये. परंतु उन्होंने एक बुड्ढे ब्राह्मण के वेश धारण किया हुआ था. उन्होंने लकड़ी में से मूर्ति बनाने का कार्य किया…परंतु एक शर्त भी रखी. शर्त के तहत वह मूर्तियो को एक बंध कक्ष 21 दिनों में बनाएंगे.

राजा इंद्रद्युम ने उनकी शर्त को स्वीकार कर लिया. कुछ दिनों के बाद उस कमरे में से आवाज आई बंद हो गई. इसलिए राजा इंद्रद्युम की पत्नी गुंडिचादेवी के कहने पर राजा ने समय के पहले ही कक्ष को खुलवा दिया.

जब कक्ष खोला गया तब भगवान जगन्नाथजी, बहन सुभद्राजी और बड़े भाई बलरामजी की मूर्तिया थी. परंतु उनके हाथ और कमर के नीचे का भाग नही थे. और आंखे भी बड़ी-बड़ी बनी हुई थी.

कुछ समय बार राजा इंद्रद्युम की मृत्यु हो जाती है. फिर राजा इंद्रद्युम का पुत्र ययाति केशरी एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाते है. और मूर्तियो को मंदिर में स्थापित करवाते है.

वर्तमान मंदिर का निर्माण कलिंक पुरी के राजा चोला गंगादेव ने प्राम्भ करवाया था…और अनंत महादेव द्वारा मंदिर का कार्य पूरा करवाया गया. उस समय जगन्नाथ मंदिर को नीलाद्रि के नाम से जाना जाता था.

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा – Lord Jagannath’s Rath Yatra

Lord Jagannath's Rath Yatra

jagannath Puri temple Image

भगवान जगन्नाथ(Jagannath Puri temple) की रथयात्रा इस धरती पर उमड़ने वाला सबसे बड़ा जनसैलाब माना जाता है. भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की कहानी भक्तो में जितनी धार्मिक और पुरानी है…उसके तैयारी की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है. यह रथ यात्रा भारत के लोगो मे जितनी प्रसिद्ध है उतनी ही विदेश के लोगो मे भी प्रसिद्ध है.

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए रथों के निर्माण का कार्य मई महीने शुरू होता में होता है. रथों का निर्माण निम की पवित्र लकड़ियों द्वारा किया जाता है. इस रथों की खास विशेषता यह होती है कि इन रथों में किसी भी प्रकार के धातु का उपयोग नही किया जाता.

भगवान जगन्नाथ जी का रथ :-

भगवान जगन्नाथजी के रथ को नंदी घोष कहा जाता है. भगवान जगन्नाथजी का रथ सबसे बड़ा होता है. जिसकी ऊंचाई 13.5 मीटर होती है…और इसके निर्माण में 16 पैयो का उपयोग किया जाता है. भगवान जगन्नाथजी के रथ का बाहरी आवरण लाल एवं पिले रंग का होता है.

बहन सुभद्रा जी का रथ :-

बहन सुभद्रा जी के रथ को पद्म रथ कहा जाता है. बहन सुभद्रा जी के रथ की ऊंचाई 12.9 मीटर होती है…और इसके निर्माण में 12 पैयो का उपयोग किया जाता है. बहन सुभद्रा जी के रथ का बाहरी आवरण लाल एवं काले रंग का होता है.

भाई बलभद्र जी का रथ :-

भाई बलभद्र जी के रथ को ताल ध्वज कहा जाता है. भाई बलभद्र जी के रथ की इंचाई 13.2 मीटर होती है…और इसके निर्माण में 14 पैयो का उपयोग किया जाता है. भाई बलभद्र जी के रथ का बाहरी आवरण लाल एवं नीले रंग का होता है.

इस बात का बहुत कम लोगो को पता है कि, जगन्नाथ पुरी(Jagannath Puri) में होने वाली रथ यात्रा पूरे तीन सप्ताह चलती है. जगन्नाथ पुरी में जून महीने की पूर्णिमा को इस त्योहार का प्राम्भ होता है. इस दिन भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्राजी और भाई बलभद्र जी को मंदिर से बाहर निकल कर 108 घडो के पानी से स्नान करवाया जाता है.

108 घडो के पानी से स्नान करने के कारण उन्हें सर्दी और जुकाम हो जाता है. फिर मंदिर के पुजारियो द्वारा भगवान की देखभाल एक मरीज की तरह की जाती है. यह देखभाल 15 दिनों तक कि जाती है. इस समय के दैरान जगन्नाथ मंदिर में दर्शन भी बंद होते है.

पुजारियो की देखभाल से भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्राजी और भाई बलभद्र जी 15 दिनों के समय मे ठीक हो जाते है और फिर अगले दिन अपने-अपने रथों में बिराजित हो कर अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते है.

भगवान जगन्नाथ जब मंदिर के बाहर आते है यह दृश्य भी अपने आप मे बहुत भव्य होता है. ऐसा लगता है कि भगवान आपने महल से बाहर निकल कर अपने भक्तों के बीच रहने आते है. भगवान जगन्नाथ जब मंदिर के बाहर आते है तब वह रथ में चढ़ने के लिए आना कानी करते है. फिर भक्तो द्वारा भजन कीर्तन और भगवान के नाम का जयघोष किया जाता है.

इसी के साथ भगवान जगन्नाथ की रात यात्रा का प्राम्भ होता है. सभी रथों को 5 किलोमीटर दूर अपने मौसी के घर गुंडिचादेवी के मंदिर में ले जाते है. वहां भगवान जगन्नाथ 10 दिनों के लिए रहते है.

जगन्नाथ पुरी(Jagannath Puri) के अलावा भारत के अन्य कई जगहों पर भी रथ यात्रा निकाली जाती है. दूसरे नंबर की रथयात्रा गुजरात के अहमदाबाद शहर में निकलती है. अहमदाबाद में रथयात्रा का प्राम्भ साल 1878 में किया गया था.

गुजरात के पाटन जिले में निकलने वाली रथ यात्रा को तीसरे नंबर की रथयात्रा माना जाता है. यहां पर रथयात्रा का प्राम्भ साल 1883 में किया गया था.

आखिर क्यों रोकी जाती है, रथयात्रा को एक मजार के सामने – Why the Jagannath Puri Temple Rath yatra is stopped in front of a tomb

हर साल भगवान जगन्नाथजी की रथयात्रा को एक मजार के सामने रोकी जाती है. वह मजार भगवान जगन्नाथ के मुस्लिम भक्त की है.

यह कहानी उस दौर की है जब भारत पर मुगल वंश का शाशन था. और उसी मुगल सेना में एक सालबेग नाम का लड़का था. सालबेग के पिता मुस्लिम औए माता हिन्दू थी.

इसीलिए वह मुस्लिम धर्म का पालन करता था.

एक बार युद्ध के दौरान सालबेग के शिर पर एक गहरी चोट लग गई थी. सालबेग ने शिर की चोट को काफी हकीमो और वैधों को बताया…और इसका इलाज भी करवाया. परंतु उसकी चोट का कोई भी इलाज नही कर पाया.

गहरी चोट के चलते सालबेग को मुगल सेना से भी निष्कासित कर दिया गया था. निष्कासित होने के कारण सालबेग काफी परेशान रहने लगा. उसकी परेशानी को देखकर सालबेग की माँ ने उसे भगवान जगन्नाथ की भक्ति करने को कहा.

माँ की बात का मान रखकर सालबेग ने भगवान जगन्नाथ की भक्ति शुरू की. कुछ दिनों के बाद सालबेग जब सो रहा था तब उसके सपने में भगवान जगन्नाथ आये और उसे अपनी चोट पर लगाने के लिए मरहम दिया. सालबेग में मरहम को अपने घाव पर लगाया और वह ठीक हो गया

जब सालबेग की नींद खुली तब उसने देखा कि उसके शिर का घाव भर गया था. इसीलिए वह भागते हुए भगवान जगन्नाथ के मंदिर की और भागा. परंतु मुस्लिम होने के कारण उसे मंदिर में प्रवेश नही मिला.

मंदिर में प्रवेश ना मिलने के कारण उसने मंदिर के बाहर ही बभगवान जगन्नाथ की भक्ति शुरू की. कुछ समय के बाद सालबेग की मुत्यु हो गई. मरते हुए सालबेग में कहा था कि, ‘अगर मेरी भक्ति में सच्चाई है तो, भगवान जगन्नाथ स्वयं मेरे मजार पर आएंगे.’

सालबेग की मजार जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) और देवीगुंडिचा मंदिर के बीच मे बनाई गई. कुछ ही दिनों में रथ यात्रा आई. जैसे ही भगवान जगन्नाथ का रथ सालबेग की मजार पर पहुचा वैसे ही रथ वहां स्थिर हो गया. काफी मसक्कत के बाद भी जब रथ नही हिल रहा था. तब सालबेग की कही हुई बात एक व्यक्ति को याद आती है.

उस व्यक्ति ने लोगो को सालबेग के नाम का जयघोष करने को कहा. जैसे ही लोगो ने सालबेग के नाम का जयघोष किया वैसे ही रथ आगे बढ़ने लगा. उस दिन से हर साल सालबेग की मजार पर रथयात्रा को रोक जाता है.

जगन्नाथ मंदिर पर बार बार किये गये हमले – Repeated Attacks on Jagannath Puri Temple

Repeated Attacks on Jagannath Temple

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आज जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में गैर हिन्दूओ का प्रवेश वर्जित है इसका प्रमुख कारण यह भी है कि, बार-बार गैर हिन्दू शाशको द्वारा जगन्नाथ मंदिर पर हमला किया था. जगन्नाथ मंदिर की आस्था और पवित्रता को मिटाने के लिए एवं मंदिर का खजाना लूटने के लिये 20 बार हमला किया गया था.

ज्यादातर हमला मुस्लिम हमलावरों द्वारा किया गया था. परंतु इस हमले में मंदिर की ओरमुख मूर्तियो को किसी भी तरह का नुकसान नही हुआ था. इसे भगवान जगन्नाथ का चमत्कार ही माना जाता है.

जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) पर पहला हमला साल 1340 में बंगाल के सुल्तान इलियास शाह द्वारा किया गया था. तब ओडिशा के राजवी नरसिह देव तृतीय थे. उन्होंने पहले ही जगन्नाथजी की मूर्तियों को सुरक्षित स्थान पर पहुचा दिया था. उसके बाद दिल्ली के सुल्तान तुगलग शाह ने साल 1360 में जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) पर दूसरा हमला किया था.

जब ओडिशा पर सूर्यवंशी राजाओ का राज कायम हुआ तब जगन्नाथ मंदिर पर तीसरी बार हमला बंगाल के मुस्लिम शाशक अलाउदीन हुसैन शाह के आदेश पर सेनापति इस्माइल गाजी ने हमला किया था. तब इस्माइल गाजी को सबक सिखाने के लिए सूर्यवंशी राजा रुद्रदेव प्रताप सिंह ने उनसे युद्ध किया था. और इस्माइल गाजी को बुरी तरह से परास्त किया था.

जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) पर सबसे बड़ा हमला साल 1568 में अफगानी सरदार काला पहाड़ ने किया था. पर वह भी जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों को नुकसान नही पहुचा पाया था. हालांकि उसने जगन्नाथ मंदिर की अन्य कई मूर्तियो को जलाकर नस्ट कर दिया था.

काला पहाड़ के हमले के बाद ओडिसा पर मुस्लिम शाशको का राज कायम हो गया था. बनाने और बिगाड़ ने का काम यू ही चलता रहा. पर हमलावर जगन्नाथ मंदिर की आस्था को नही हिला पाए थे.

काला पहाड़ के हमले के बाद जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) पर साल 1552 में अफगानी सरदारों द्वारा हमला किया गया, साल 1601 में मिर्जा मक्की द्वारा किया गया था, फिर साल 1611 में, साल 1621 में और साल 1641 में भी हमला किया गया.

जगन्नाथ मंदिर पर 17वां हमला दिल्ली के क्रूर शाशक औरंगजेब ने साल 1652 में करवाया था. औरंगजेब ने जगन्नाथ मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त करने का फरमान जारी किया था…और वह काफी हद तक सफल भी हो गया था.  ऐसे करके जगन्नाथ मंदिर पर आखरी हमला फतेह खान द्वारा किया गया था.

जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) पर इतनी बार गैर हिन्दू शाशको द्वारा हमला किये जाने पर ही शायद आज जगन्नाथ मंदिर में गैर हिन्दूओ का प्रवेश वर्जित है. जगन्नाथ मंदिर में सनातन धर्म के हिन्दू, सिख धर्म और भारत के ही बौद्धों का प्रवेश होता है. बाकियो का प्रवेश वर्जित है.

जगन्नाथ मंदिर में गैर हिन्दुओ का प्रवेश है वर्जित – Entry of non-Hindus is forbidden in Jagannath puri Temple

Jagannath Temple indira gandhi

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आज जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में गैर हिन्दूओ का प्रवेश वर्जित है इसका प्रमुख कारण यह भी है कि, बार-बार गैर हिन्दू शाशको द्वारा जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) पर हमला किया था. जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में सनातन धर्म के हिन्दू, सिख धर्म और भारत के ही बौद्धों का प्रवेश होता है. बाकियो का प्रवेश वर्जित है.

1. जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश ना मिलने की सूची पहला नाम आता है, भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का.

साल 1984 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने जब ओडिशा के दोहरा किया था. तब उनको जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में मंदिर के पुजारियों द्वारा प्रवेश नही दिया गया था. क्योकि मंदिर के पुजारी मानते है कि, इंदिरा गांधी को गांधी उपाधि फ़िरोफ जहाँगीर ग़ांधी से मिली थी…जो इंदिरा गांधी के पति थे.

इसीलिए मंदिर के पुजारी इंदिरा गांधी को पारसी धर्म की मानते है. इसलिए साल 1984 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में प्रवेश नही दिया गया था.

2. जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश ना मिलने की सूची में दूसरा नाम थाईलैंड की रानी कॉनशॉर्ट का आता है.

साल 2005 में थाईलैंड की रानी कॉनशॉर्ट ने जब भारत का दोहरा किया था तब वह ओडिशा भी आई थी. उन्ही इच्छा थी कि वह भगवान जगन्नाथजी के दर्शन कर परंतु मंदिर के पुजारियो द्वारा उन्हें भी प्रवेश नही दिया गया था.

क्योंकि, थाईलैंड की रानी कॉनशॉर्ट बौद्ध धर्म की थी…और जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में केवल भारत के बौद्धों को ही प्रवेश की अनुमति है.

3. जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश ना मिलने की सूची में तीसरा नाम श्रीला प्रभुपाद के शिष्यो का आता है.

जब श्रीला प्रभुपाद ने अपने कुछ शिष्यो के साथ जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में प्रवेश करने की कोशिश की थी. तब उनके शिष्यों को भी मंदिर में प्रवेश नही दिया गया था. क्योकि, श्रीला प्रभुपाद के ज्यादातर शिष्य विदेशी थे.

इस घटना के बाद ही भारत के अलावा दुनियाभर में रथयात्रा की प्रथा का प्राम्भ हुआ था. और इस प्रथा का प्राम्भ श्रीला प्रभुपाद ने किया था. श्रीला प्रभुपाद वही व्यक्ति है जिन्होंने इस्कोन मंदिरो की स्थापना की थी.

4. साल 2006 में स्विजरलैंड के एक व्यक्ति ने जब जगन्नाथ मंदिर में 1 करोड़ 78 लाख का दान दिया था. परंतु, वह व्यक्ति ईसाई धर्म का होने के कारण उसे जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri Temple) में प्रवेश नही दिया गया था.
इसी बात से साफ जाहिर होता है कि, अगर आपको  जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में प्रवेश करना हो तो आपको सनातन हिन्दू होना अनिवार्य है.

जगन्नाथ मंदिर के बारे में कुछ रोचक तथ्य – Some Interesting facts about Jagannath Puri Temple

  • ● हवा के विपरीत लहराता है, भगवान जगन्नाथ के मंदिर(Jagannath Puri temple) का ध्वज. हवा अगर पूर्व दिशा से पचिम दिशा में बहती है तो ध्वज पचिम दिशा से पूर्व दिशा में लहराता है.
  • ● दिन के दरमियान नही दिखती है गुम्मट की छाया. दिवस दरमियान भगवान जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) के पास खड़े होकर नही देख सकते मंदिर का घुम्मट.
  • ● पूरी में किसी भी जगह से खड़े रहकर मंदिर पर लगे सुदर्शन चक्र को देखने से वह आपके सामने ही दिखता है. यह चक्र अष्ट धातु का बना हुआ है…और इसे दूसरे निल चक्र के नाम से भी बुलाया जाता है.
  • ● आप ने कई मंदिर के घुम्मट के आसपास पक्षियो को बैठते हुए देखा होगा. परंतु आज तक भगवान जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) के घुम्मट के आसपास पक्षियो को बैठते हुए तथा उड़ते हुए नही देखा गया.
  • ● भगवान जगन्नाथ के मंदिर(Jagannath Puri temple) की ऊंचाई 214 फिट है. हर शाम पुजारी द्वारा उल्टा चढ़ कर मंदिर की ध्वजा को बदला जाता है. हजारो वर्षो में आज तक कोई भी सीधा चढ़ कर मंदिर की ध्वजा को नही बदल पाया.
  • ● जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) में भोजन बनाने के लिए  माटी के सात बर्तनों का उपयोग किया जाता है. जिसको एक के ऊपर एक रखा जाता है. पर हैरानी की बात यह है कि सबसे ऊपर रखे बर्तन में खाना सबसे पहले पकता है. जबकि आग सबसे नीचे वाले बर्तन में लगाई जाती है.
  • ● आम दिनों के समय हवा समुद्र से किनारे की तरफ बहती है और रात के समय उसके विपरीत होता है. परंतु जगन्नाथ पुरी(Jagannath Puri) में दिन के समय हवा किनारे से समुद्र की तरफ बहती है और रात के समय उसके विपरीत होता है. यह भी एक हैरान कर देंने वाला रहस्य है.
  • ● भगवान जगन्नाथ मंदिर(Jagannath Puri temple) के मुख्य प्रवेश द्वार को सिंहद्वार कहा जाता है. उसके अंदर कदम रखते ही समुद्र की आवाज आई बंद हो जाती है. जब कि मंदिर के बाहर समुद्र की आवाज बहुत जोर से सुनाई देती है.
  • ● हर 12 साल में एक बार भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्राजी और बड़े भाई बलरामजी की मूर्तियो का नवकलवर किया जाता है. यानी मूर्तियो को फिर से बनाया जाता है परंतु आश्चर्य की बात यह है कि भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्राजी और बड़े भाई बलरामजी की मूर्तियों का रूप नही बदलता.
  • ● एक मान्यता यह भी है कि समुद्र ने पुरी नगर को तीन बार ध्वस्त किया था. तब भगवान जगन्नाथ ने हनुमान जी को नगर की रक्षा के लिए समुद्र तट पर नियुक्त किया था. परंतु हनुमान जी भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए नगर में आते थे और उनके पीछे समुद्र भी नगर में घुस जाता था. इसलिए भगवान जगन्नाथजी ने हनुमानजी को सोने की बेड़ियो में बांध लिया था.
  • ● पुरी में हर साल आषाढ़ मास में भगवान जगननाथ की रथयात्रा निकलती है. जिसे दुनिया की सबसे बड़ी रथयात्रा भी माना जाता है. उस दिन जगन्नाथ पुरी(Jagannath Puri) में बारिश होती ही है…और यह परंपरा वर्षो से चली आ रही है.

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