History Of Jagannath Temple

जगन्नाथ पुरी मंदिर का इतिहास | History Of Jagannath Temple, Puri

द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के 36 साल बाद और द्वारिका नगरी के नष्ट हो जाने के बाद श्री कृष्ण जब हिरण्य नदी के किनारे विश्राम कर रहे थे, तब जरा नामक पारधी ने उनके पैर पर बाण मार था। यहीं श्रीकृष्ण ने अपना देह त्याग किया था। सत्य, प्रेम, भक्ति और शक्ति के पुजारी श्रीकृष्ण ने ईस पूर्व 3102 में चैत्री सुक्र प्रतिबध की दोपहर 2:27 मिनट में अपने मानव शरीर को छोड़कर चले गए थे।

फिर अर्जुन द्वारा श्री कृष्ण का अंतिम संस्कार किया गया। परंतु बहुत कोशिश के बाद भी श्री कृष्ण के शरीर का एक अंग (नाभि) नहीं जल रहा था। तब अर्जुन ने नाभि को समुद्र में विसर्जित कर दिया था।

कुछ समय बाद वह नाभि श्री कृष्ण के नीले रंग की एक मूर्ति में परिवर्तित हो गई, जो विस्वावस्थ नामक आदिवासी को मिली। मूर्ति नीले रंग की होने के कारण विस्वावस्थ ने मूर्ति का नाम नीलमाधव रखा।

विस्वावस्थ ने नीलमाधव की मूर्ति को पास के जंगल में एक गुफा में छुपा दिया और बड़े भक्ति भाव से नीलमाधव की पूजा करने लगा। इस बात की खबर राजा इंद्रद्युम को लगी। मूर्ति के बारे में पता लगाने के लिए राजा इंद्रद्युम अपने विश्वासु मंत्री विद्यापति नामक ब्राह्मण को जंगल भेजते हैं।

विद्यापति मूर्ति के बारे में जानने के लिए विस्वावस्थ के पास आते हैं, परंतु विद्यापति को विस्वावस्थ की पुत्री से प्रेम हो जाता है और वह विस्वावस्थ की पुत्री से विवाह कर लेते हैं। एक बार विद्यापति अपने ससुर विस्वावस्थ से मूर्ति के दर्शन कराने की विनती करते हैं।

विद्यापति की बार-बार की विनती के कारण विस्वावस्थ ने अपने दामाद को मना नहीं किया और उन्हें आंखों पर पट्टी बांध कर उस गुफा में ले गए। परंतु विद्यापति भी बहुत चालाक था, उसने रास्ते में सरसों के बीज गिरा दिए।

कुछ दिनों बाद वह बीज अंकुरित हो गए और गुफा का रास्ता साफ दिखाई देने लगा। गुफा के बारे में विद्यापति राजा इंद्रद्युम को बताते हैं। जब राजा इंद्रद्युम नीलमाधव के दर्शन के लिए गुफा में जाते हैं, तो वहां पर नीलमाधव की मूर्ति नहीं मिलती है।

नीलमाधव के दर्शन न होने के कारण राजा इंद्रद्युम बहुत निराश होकर अपने राज भवन में लौट आते हैं और अपनी गलती का पश्चाताप हृदयपूर्वक करते हैं। एक रात जब राजा इंद्रद्युम सो रहे होते हैं, तब स्वयं भगवान विष्णु उनके सपने में आते हैं और कहते हैं कि, ‘कुछ दिनों में समुद्र तट पर एक लकड़ी का लट्ठा तैरते हुए आएगा और उस पर शंख का चिह्न भी बना होगा। उसी लकड़ी से मूर्ति बनाकर मंदिर में स्थापित करने की सूचना देते हैं।’

भगवान विष्णु के कहे अनुसार एक लकड़ी का लट्ठा समुद्र में तैरते हुए आया। राजा इंद्रद्युम ने तुरंत अपने राज्य के महान शिल्पकारों को बुलाकर उस लकड़ी से मूर्ति बनाने का कार्य दिया। परंतु लकड़ी के स्पर्श से ही शिल्पकारों के औजार टूट जाते थे। इस बात से राजा इंद्रद्युम काफी परेशान हो गए।

फिर एक दिन देवताओं के शिल्पकार श्री विश्वकर्माजी राजा इंद्रद्युम के राज्य में आए, परंतु उन्होंने एक बूढ़े ब्राह्मण के वेश धारण किया हुआ था। उन्होंने लकड़ी से मूर्ति बनाने का कार्य किया, परंतु एक शर्त भी रखी। शर्त के तहत वह मूर्तियों को एक बंद कक्ष में 21 दिनों में बनाएंगे।

राजा इंद्रद्युम ने उनकी शर्त को स्वीकार कर लिया। कुछ दिनों के बाद उस कमरे में से आवाज आनी बंद हो गई। इसलिए राजा इंद्रद्युम की पत्नी गुंडिचादेवी के कहने पर राजा ने समय से पहले ही कक्ष को खुलवा दिया।

जब कक्ष खोला गया तब भगवान जगन्नाथजी, बहन सुभद्राजी और बड़े भाई बलरामजी की मूर्तियां थीं। परंतु उनके हाथ और कमर के नीचे का भाग नहीं थे और आंखें भी बड़ी-बड़ी बनी हुई थीं।

कुछ समय बाद राजा इंद्रद्युम की मृत्यु हो गई। फिर राजा इंद्रद्युम के पुत्र ययाति केशरी ने एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया और मूर्तियों को मंदिर में स्थापित करवाया।

वर्तमान मंदिर का निर्माण कलिंग पुरी के राजा चोला गंगादेव ने प्रारंभ करवाया था और अनंत महादेव द्वारा मंदिर का कार्य पूरा करवाया गया। उस समय जगन्नाथ मंदिर को नीलाद्रि के नाम से जाना जाता था।

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा – Lord Jagannath’s Rath Yatra

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा इस धरती पर उमड़ने वाला सबसे बड़ा जनसैलाब माना जाता है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की कहानी भक्तों में जितनी धार्मिक और पुरानी है, उसकी तैयारी की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है। यह रथयात्रा भारत के लोगों में जितनी प्रसिद्ध है उतनी ही विदेश के लोगों में भी प्रसिद्ध है।

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए रथों के निर्माण का कार्य मई महीने में शुरू होता है। रथों का निर्माण नीम की पवित्र लकड़ियों द्वारा किया जाता है। इन रथों की खास विशेषता यह होती है कि इनमें किसी भी प्रकार की धातु का उपयोग नहीं होता।

भगवान जगन्नाथ जी का रथ:

भगवान जगन्नाथजी के रथ को नंदी घोष कहा जाता है। भगवान जगन्नाथजी का रथ सबसे बड़ा होता है। जिसकी ऊंचाई 13.5 मीटर होती है और इसके निर्माण में 16 पहियों का उपयोग किया जाता है। भगवान जगन्नाथजी के रथ का बाहरी आवरण लाल एवं पीले रंग का होता है।

बहन सुभद्रा जी का रथ:

बहन सुभद्रा जी के रथ को पद्म रथ कहा जाता है। बहन सुभद्रा जी के रथ की ऊंचाई 12.9 मीटर होती है और इसके निर्माण में 12 पहियों का उपयोग किया जाता है। बहन सुभद्रा जी के रथ का बाहरी आवरण लाल एवं काले रंग का होता है।

भाई बलभद्र जी का रथ:

भाई बलभद्र जी के रथ को ताल ध्वज कहा जाता है। भाई बलभद्र जी के रथ की ऊंचाई 13.2 मीटर होती है और इसके निर्माण में 14 पहियों का उपयोग किया जाता है। भाई बलभद्र जी के रथ का बाहरी आवरण लाल एवं नीले रंग का होता है।

इस बात का बहुत कम लोगों को पता है कि जगन्नाथ पुरी में होने वाली रथयात्रा पूरे तीन सप्ताह चलती है। जगन्नाथ पुरी में जून महीने की पूर्णिमा को इस त्योहार का प्रारंभ होता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्राजी और भाई बलभद्र जी को मंदिर से बाहर निकल कर 108 घड़ों के पानी से स्नान करवाया जाता है।

108 घड़ों के पानी से स्नान करने के कारण उन्हें सर्दी और जुकाम हो जाता है। फिर मंदिर के पुजारियों द्वारा भगवान की देखभाल एक मरीज की तरह की जाती है। यह देखभाल 15 दिनों तक की जाती है। इस समय के दौरान जगन्नाथ मंदिर में दर्शन भी बंद होते हैं।

पुजारियों की देखभाल से भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्राजी और भाई बलभद्र जी 15 दिनों के समय में ठीक हो जाते हैं और फिर अगले दिन अपने-अपने रथों में विराजित होकर अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं।

भगवान जगन्नाथ जब मंदिर के बाहर आते हैं यह दृश्य भी अपने आप में बहुत भव्य होता है। ऐसा लगता है कि भगवान अपने महल से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच रहने आते हैं। भगवान जगन्नाथ जब मंदिर के बाहर आते हैं तब वह रथ में चढ़ने के लिए आनाकानी करते हैं। फिर भक्तों द्वारा भजन-कीर्तन और भगवान के नाम का जयघोष किया जाता है।

इसी के साथ भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का प्रारंभ होता है। सभी रथों को 5 किलोमीटर दूर अपने मौसी के घर गुंडिचादेवी के मंदिर में ले जाया जाता है। वहां भगवान जगन्नाथ 10 दिनों के लिए रहते हैं।

जगन्नाथ पुरी के अलावा भारत के अन्य कई जगहों पर भी रथयात्रा निकाली जाती है। दूसरे नंबर की रथयात्रा गुजरात के अहमदाबाद शहर में निकलती है। अहमदाबाद में रथयात्रा का प्रारंभ साल 1878 में किया गया था।

गुजरात के पाटन जिले में निकलने वाली रथयात्रा को तीसरे नंबर की रथयात्रा माना जाता है। यहां पर रथयात्रा

का प्रारंभ साल 1824 में किया गया था।

रथयात्रा के पहले दिन को गुंडिचा यात्रा, द्वितीय दिन को हेरा पंचमी और रथयात्रा के अंतिम दिन को बहुदा यात्रा कहा जाता है। बहुदा यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र जी को मौसी के घर से पुनः जगन्नाथ मंदिर में लाया जाता है।

निश्चित रूप से! यहाँ लेख का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है और शीर्षकों और छवियों को बरकरार रखते हुए इसे साफ किया गया है:


रथ यात्रा को एक समाधि के सामने क्यों रोका जाता है

हर साल भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा एक समाधि के सामने रोकी जाती है। यह समाधि भगवान जगन्नाथ के एक मुस्लिम भक्त की है।

यह कहानी भारत में मुगल शासन के समय की है। उस समय, सालबेगा नाम का एक लड़का मुगल सेना में सेवा करता था। सालबेगा के पिता मुस्लिम थे और उनकी माँ हिंदू थीं, इसलिए उन्होंने मुस्लिम धर्म का पालन किया।

एक बार, एक लड़ाई के दौरान, सालबेगा को सिर में गंभीर चोट लगी। उन्होंने कई डॉक्टरों और चिकित्सकों से परामर्श किया, लेकिन कोई भी उनके घाव को ठीक नहीं कर सका। उनकी गहरी चोट के कारण, उन्हें मुगल सेना से निकाल दिया गया, जिससे उन्हें बहुत परेशानी हुई। उनकी हालत देखकर, सालबेगा की माँ ने उन्हें भगवान जगन्नाथ की पूजा करने की सलाह दी।

अपनी माँ के वचनों का सम्मान करते हुए, सालबेगा ने खुद को भगवान जगन्नाथ को समर्पित करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों के बाद, भगवान जगन्नाथ उसके सपने में आए और उसके घाव पर मरहम लगाया। सालबेगा ने मरहम लगाया और ठीक हो गया।

जागने पर, सालबेगा ने देखा कि उसके सिर का घाव ठीक हो गया था। कृतज्ञता में, वह जगन्नाथ मंदिर की ओर भागा, लेकिन उसकी मुस्लिम पहचान के कारण उसे प्रवेश नहीं दिया गया। नतीजतन, उसने मंदिर के बाहर भगवान जगन्नाथ की पूजा करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद, सालबेगा की मृत्यु हो गई, उन्होंने घोषणा की कि यदि उनकी भक्ति सच्ची है, तो भगवान जगन्नाथ उनकी समाधि पर आएंगे।

सालबेगा की समाधि जगन्नाथ मंदिर और गुंडिचा मंदिर के बीच बनाई गई थी। जब रथ यात्रा आई, तो रथ सालबेगा की समाधि के सामने रुक गया और कई प्रयासों के बावजूद आगे नहीं बढ़ा। एक व्यक्ति ने सालबेगा के शब्दों को याद किया और लोगों से उनका नाम जपने का आग्रह किया। जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, रथ फिर से चलने लगा। उस दिन से, हर साल सालबेगा की समाधि के सामने रथ यात्रा रोक दी जाती है।

जगन्नाथ मंदिर पर बार-बार हमले

जगन्नाथ मंदिर पर बार-बार हमले

आज जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। इसका एक मुख्य कारण गैर-हिंदू शासकों द्वारा मंदिर पर बार-बार किए गए हमले हैं। मंदिर की पवित्रता को नष्ट करने और इसके खजाने को लूटने के लिए 20 हमले किए गए।

अधिकांश हमले मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा किए गए, लेकिन मंदिर की मुख्य मूर्तियों को कभी नुकसान नहीं पहुँचाया गया, जिसे भगवान जगन्नाथ का चमत्कार माना जाता है।

जगन्नाथ मंदिर पर पहला हमला 1340 में बंगाल के सुल्तान इलियास शाह ने किया था। उस समय नरसिंहदेव तृतीय ओडिशा के शासक थे। उन्होंने पहले ही जगन्नाथ की मूर्तियों को सुरक्षित कर लिया था। दूसरा हमला 1360 में दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने किया था।

ओडिशा में सूर्यवंशी राजाओं के शासनकाल के दौरान, तीसरा हमला बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह द्वारा आदेशित किया गया था, और इसका नेतृत्व जनरल इस्माइल गाजी ने किया था। सूर्यवंशी राजा रुद्रदेव प्रताप सिंह ने गाजी से युद्ध किया और उसे हरा दिया।

सबसे बड़ा हमला 1568 में अफगान सरदार काला पहाड़ ने किया था। हालाँकि उसने कई मूर्तियों को नष्ट कर दिया, लेकिन वह जगन्नाथ की मुख्य मूर्तियों को नुकसान नहीं पहुँचा सका।

काला पहाड़ के हमले के बाद, ओडिशा में मुस्लिम शासकों का दबदबा रहा। मंदिर पर हमले होते रहे, लेकिन इसकी पवित्रता बरकरार रही।

जगन्नाथ मंदिर पर इसके बाद के हमले 1552 में अफगान सरदारों द्वारा, 1601 में मिर्जा मक्की द्वारा, तथा फिर 1611, 1621 और 1641 में किए गए।

जगन्नाथ मंदिर पर 17वां हमला 1652 में दिल्ली के क्रूर शासक औरंगजेब द्वारा किया गया, जिसने मंदिर को पूरी तरह से नष्ट करने का आदेश दिया, और लगभग सफल भी हो गया। अंतिम हमला फतेह खान द्वारा किया गया था।

गैर-हिंदू शासकों द्वारा लगातार किए गए इन हमलों के कारण, शायद आज जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। केवल सनातन धर्म के हिंदू, सिख और भारत के बौद्ध धर्मावलंबियों को ही प्रवेश की अनुमति है, जबकि अन्य को नहीं।

जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है

जगन्नाथ मंदिर इंदिरा गांधी

जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध गैर-हिंदू शासकों द्वारा बार-बार किए गए हमलों के कारण भी है।

  1. इंदिरा गांधी:
    1984 में, भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पुजारियों ने जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश करने से मना कर दिया था। वे उन्हें उनके पति फिरोज जहांगीर गांधी के कारण पारसी धर्म का अनुयायी मानते थे, जिनसे उन्होंने अपना उपनाम लिया था।
  2. थाईलैंड की रानी:
    2005 में, थाईलैंड की रानी को भी ओडिशा की अपनी यात्रा के दौरान जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश करने से मना कर दिया गया था। वह बौद्ध थीं, लेकिन मंदिर में केवल भारतीय बौद्धों को ही प्रवेश की अनुमति है।
  3. श्रील प्रभुपाद के शिष्य:
    जब श्रील प्रभुपाद ने अपने शिष्यों के साथ मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास किया, तो उनके विदेशी शिष्यों को प्रवेश से वंचित कर दिया गया। इस घटना के कारण दुनिया भर में रथ यात्रा की शुरुआत हुई, जिसकी शुरुआत श्रील प्रभुपाद ने की, जिन्होंने इस्कॉन मंदिरों की स्थापना की।
  4. स्विस दानकर्ता:
    2006 में, एक स्विस व्यक्ति जिसने जगन्नाथ मंदिर को 1.78 करोड़ रुपये दान किए थे, उसे प्रवेश से वंचित कर दिया गया क्योंकि वह ईसाई था।

जगन्नाथ मंदिर के बारे में कुछ रोचक तथ्य – Some Interesting facts about Puri Jagannath Temple

  • ● हवा के विपरीत लहराता है, भगवान जगन्नाथ के मंदिर का ध्वज. हवा अगर पूर्व दिशा से पचिम दिशा में बहती है तो ध्वज पचिम दिशा से पूर्व दिशा में लहराता है.
  • ● दिन के दरमियान नही दिखती है गुम्मट की छाया. दिवस दरमियान भगवान जगन्नाथ मंदिर के पास खड़े होकर नही देख सकते मंदिर का घुम्मट.
  • ● पूरी में किसी भी जगह से खड़े रहकर मंदिर पर लगे सुदर्शन चक्र को देखने से वह आपके सामने ही दिखता है. यह चक्र अष्ट धातु का बना हुआ है…और इसे दूसरे निल चक्र के नाम से भी बुलाया जाता है.
  • ● आप ने कई मंदिर के घुम्मट के आसपास पक्षियो को बैठते हुए देखा होगा. परंतु आज तक भगवान जगन्नाथ मंदिर के घुम्मट के आसपास पक्षियो को बैठते हुए तथा उड़ते हुए नही देखा गया.
  • ● भगवान जगन्नाथ के मंदिर की ऊंचाई 214 फिट है. हर शाम पुजारी द्वारा उल्टा चढ़ कर मंदिर की ध्वजा को बदला जाता है. हजारो वर्षो में आज तक कोई भी सीधा चढ़ कर मंदिर की ध्वजा को नही बदल पाया.
  • ● जगन्नाथ मंदिर में भोजन बनाने के लिए  माटी के सात बर्तनों का उपयोग किया जाता है. जिसको एक के ऊपर एक रखा जाता है. पर हैरानी की बात यह है कि सबसे ऊपर रखे बर्तन में खाना सबसे पहले पकता है. जबकि आग सबसे नीचे वाले बर्तन में लगाई जाती है.
  • ● आम दिनों के समय हवा समुद्र से किनारे की तरफ बहती है और रात के समय उसके विपरीत होता है. परंतु जगन्नाथ पुरी में दिन के समय हवा किनारे से समुद्र की तरफ बहती है और रात के समय उसके विपरीत होता है. यह भी एक हैरान कर देंने वाला रहस्य है.
  • ● भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार को सिंहद्वार कहा जाता है. उसके अंदर कदम रखते ही समुद्र की आवाज आई बंद हो जाती है. जब कि मंदिर के बाहर समुद्र की आवाज बहुत जोर से सुनाई देती है.
  • ● हर 12 साल में एक बार भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्राजी और बड़े भाई बलरामजी कीमूर्तियो का नवकलवर किया जाता है. यानी मूर्तियो को फिर से बनाया जाता है परंतु आश्चर्य की बात यह है कि भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्राजी और बड़े भाई बलरामजी की मूर्तियों का रूप नही बदलता.
  • ● एक मान्यता यह भी है कि समुद्र ने पुरी नगर को तीन बार ध्वस्त किया था. तब भगवान जगन्नाथ ने हनुमान जी को नगर की रक्षा के लिए समुद्र तट पर नियुक्त किया था. परंतु हनुमान जी भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए नगर में आते थे और उनके पीछे समुद्र भी नगर में घुस जाता था. इसलिए भगवान जगन्नाथजी ने हनुमानजी को सोने की बेड़ियो में बांध लिया था.
  • ● पुरी में हर साल आषाढ़ मास में भगवान जगननाथ की रथयात्रा निकलती है. जिसे दुनिया की सबसे बड़ी रथयात्रा भी माना जाता है. उस दिन जगन्नाथ पुरी में बारिश होती ही है…और यह परंपरा वर्षो से चली आ रही है.

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